
बाबुकुंवरसिंहतेगवाबहादुर……………..
मस्ती की थी छिड़ी रागिनी आजादी का गाना था,
भारत के कोने कोने में होता यही तराना था।
उधर खड़ी थी लक्ष्मीबाई और पेशवा नाना था,
इधर बिहारी-वीर बांकुड़ा खड़ा हुआ मस्ताना था।
अस्सी बरसों की हड्डी में जागा जोश पुराना था,
सब कहते हैं, कुंअर सिंह भी बड़ा वीर मर्दाना था।
दुष्मन तट पर पहुंच गए, जब कुंअरसिंह करते थे पार,
गोली आकर लगी बांह में, दायां हाथ हुआ बेकार।
हुई अपावन बाहु जान, बस काट दिया लेकर तलवार,
‘ले गंगे, यह हाथ आज’, तुझको ही देता हूं उपहार।
वीर-भक्त की वही जान्हवी को मानो नजराना था,
सब कहते हैं कुंबर सिंह भी बड़ा वीर मर्दाना था।
भारत माता के वीर सपूत को कोटि कोटि नमन।




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