दैनिक खोज खबर प्रबंध संपादक ब्रजेश भारती से विशेष बातचीत :-
दुर्घटना वाले दिन सुबह – सुबह मैं और मेरा भाई बनारसी सिंह बदला बाजार करने गये थे, दिन भर बाजार करने के बाद शाम को ट्रेन पकड़ने बदला घाट स्टेशन पहुंचे.वहां हमारी मुलाकात मेरे पड़ोसी गंगा से हुई.लोटे में रसगुल्ले लिए खुशी से लबरेज गंगा ने बताया कि बेटी के शादी के लिए कुटुंब देखने आया था, बात पक्की हो गई है इसलिए घर वालो के लिए मिठाई लेकर जा रहा हूँ.उससे बातचीत चल ही रही थी कि 416 डाउन पैसेंजर ट्रेन बदला घाट स्टेशन पर आकर रुकी।ट्रेन में भीड़ ज्यादा थी, खचाखच यात्रियों से भरी ट्रेन में हम दोनों भाई और हमारा पड़ोसी गंगा बमुश्किल यात्रियो के बीच से होते हुए सीट तक पहुंचे.सीट खाली नही थी इसलिए सीट के ऊपर लगे लकड़ी के फट्टे पर मैं बैठ गया, वही मेरा भाई और गंगा भीड़ में ही यात्रियों के बीच खड़ा रहा।ट्रेन स्टेशन से खुल कर थोड़ी दूर बढ़ी ही थी कि तेज आंधी शुरू हो गई.आंधी की रफ्तार अन्य दिनों की अपेक्षा ज्यादा थी.थोड़ी ही देर में बारिश भी पड़ने लगी.डिब्बो के अंदर बारिश की बुँदे आने लगी तो यात्रियों ने धड़ाधड़ बॉगी के सभी खिड़कियां बंद करनी शुरू कर दी.वही तेज आंधी रुकने का नाम नही ले रही थी जिससे डिब्बे के गेट पर खड़े यात्रियों को खासी परेशानी हो रही थी.इसी बीच किसी ने डिब्बे के गेट को बंद करने को कहा तो गंगा ने जोर से गेट बंद कर रहा हूँ बोल कर गेट बंद कर दिया.जबकि, डिब्बे के अन्य गेट शायद खुले थे.तभी गाड़ी जोर से हिलती है, हम सभी यात्रियों का अंदेशा हो गया कि कुछ बुरा होने वाला है.मैने अपने भाई को कहा कि बनारसी, शायद ट्रेन पलट जायेगी.बनारसी यह सुन स्तब्ध था.इसी बीच अचानक जोर से हिलते हुए ट्रेन पलट गई…..मेरी आँख पानी में खुली। चूंकि, मुझे तैरना आता था तो मैने आँख खुलते ही तैरना शुरू किया।जब मुझे लगा कि मैं संभलने वाली स्थिति में हूँ तो मैने बनारसी और गंगा को आवाज दी।परंतु बागमती के उस जल से गंगा की तो आवाज नही आई परंतु हे हो भईया कहता बनारसी की आवाज कानो में गूंजी।मै चौक गया और इधर – उधर देखने लगा, तब तक बनारसी ने आकर मेरे पीठ को पकड़ लिया.धीरे – धीरे हम तैरने लगे.बनारसी ने मुझसे पूछा कि भैया, हम बच तो जायेंगे.मैने इसे ढाढ़स बंधाते हुए बताया कि जरूर बचेंगे.तब तक कई और पानी में हल्का – हल्का तैरते – तैरते हमारे पास पहुँच गये.सभी को साथ लिए मैं किनारे पर पहुंचा. बनारसी को कई जगह चोट लगी थी और कई जगह से खून बह रहा था, इसलिए थोड़ी देर बाद उसे प्रशासन की सहायता से खगड़िया अस्पताल में भर्ती कराया गया।मुझे भी शरीर में कई जगह चोट लगी थी पर मेरा दिमाग गंगा पर था, लग रहा था कही से भी वह आवाज दे दे की मैं बागमती में कूद कर उसे बचा लूँ..”
वर्तमान में बहादुर सिंह और बनारसी सिंह जीवन के अंतिम पायदान पर है।बहादुर सिंह अपने दस पोता और सात पोती के संग जिंदगी जी रहे है। बनारसी सिंह को एक पोता और एक पोती है जिसे पुचकारते उनकी दिन और रात गुजरती है।




Recent Comments