Category Archives: ●साहित्य

​🔴🔴दहेज एक अभिशाप 🔴🔴

​दहेज एक अभिशाप ।।साहित्य में कविता का एक अलग ही महत्व है। जिसमें छंद के साथ रस भी मौजूद रहता है ।कविता कवियों के हृदय में उठ रही वेतनों की आवाज है, प्रस्तुत है एक कविता जिसका शीर्षक दहेज प्रथा ।

संकलन:- नौशाद आलम 

प्रस्तुति :-कुंजबिहारी शास्त्री “दैनिक खोज खबर “जिला संवाददाता, मधेपुरा 

दहेज प्रथा 

हमारे पूरे समाज में 

एक विकराल राक्षस का 

रूप धारण कर 

सुरसा सा मुँह लिए 

हमारी बहु- बेटियों को 

एक ही क्षण में लील जाता है 

कितनों की इहलीला 

समाप्त कर यह 

अपने आकार को 

और भी बड़ा कर 

बढ़ता चला जाता है 

आओ मिलकर 

प्रयास करें हम 

इसके बढ़ते हुए आकार 

और इसके बढ़ते हुए 

मनोबल को घटाने का ।
आओ मिलकर 

प्रयास करें हम 

अपने संकल्पों द्वारा 

इस कुरीति के खिलाफ 

और सुर में आवाज उठाने का ।
आओ मिलकर 

प्रयास करें हम 

इस अभिशाप नामक 

पारंपरिक प्रथा को खतम कर 

उन लालची भेड़ियों का 

दिमाग सही जगह पर लाने का ।
आओ मिलकर 

प्रयास करें हम 

समाज से ऐसे कलंक 

और ऐसी कुरीति को 

जड़ से मिटाने का ।
आओ मिलकर 

प्रयास करें हम 

दहेज की आग में झुलसी 

उन बेबस, कमजोर 

और लाचार के बुझे मन में 

आशा का दीप जलाने का ।
आओ मिलकर 

प्रयास करें हम 

बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ 

का संदेशा 

हर एक शहर ,

हर एक गाँव ,

हर एक गली और 

हर एक घर तक पहुँचाने का ।
आओ मिलकर 

प्रयास करें हम 

पूरे समाज को जागृत कर 

अपनी बहु- बेटियों के 

जीवन को बचाने का 

प्रयास करें हम 

उनके आने वाले कल 

और आज को सजाने का ।
आओ मिलकर 

प्रयास करें हम 

दहेज रूपी इस कलयुगी 

दानव के विनाश हेतु 

मुख्यमंत्री द्वारा दहेज प्रथा

उन्मूलन का हिस्सा बनकर 

इस मुहिम को 

आगे तक ले जाने का ।

  •           रेशमा रानी (कवियत्री) 
  •              न.शि.म.वि.बलिया 
  •                     ( बेगूसराय )

शक्ल कि न तो सूरत होती है (गजल )

🔴🔴शक्ल कि न तो सूरत होती है गजल 🔴🔴

प्रस्तुति :-कुंजबिहारी शास्त्री “दैनिक खोज खबर” जिला संवाददाता ,मधेपुरा 

संकलन :-नौशाद आलम

बेगुसराय जिले के छोटी बलिया की रहने वाली रेशमा रानी पेशे से दोनो पति पत्नी शिक्षक है । बच्चे को नियमित शिक्षा देना इनकी आदत में शुमार है ।गरीब बच्चे को मुफ्त में शिक्षा एवं कापी कलम किताब स्लेट पेंसिल देना ताकि कोई भी बच्चा अशिक्षा के कारण अंधकार में न रहे इसी बीच कुछ वक्त अपने मन को हल्का करने के लिए कविता भी लिख लेती है कुछ अंश कविता के में दैनिक खोज खबर के पाठकों के सामने पेश किया हूँ ।

 

गजल 

इसकी शक्ल 

न तो कोई 

सूरत होती है 

पर,

मेरे दोस्तों ने कहा 

कि… जिन्दगी 

बहुत खूबसूरत होती है ,

जब 

मैंने देखा 

अपनी ही जिन्दगी को 

थोड़े करीब से 

जाने क्यों 

मुझे यह लगी 

कुछ अजीबो गरीब से ,

सुख का 

साथी कहूँ 

या फिर इसे 

दुख की कहूँ सहेली 

कभी सुलझी हुई लगे 

तो कभी 

उलझी हुई पहेली ,

यह जितनी करीब 

ग़म के 

खुशियों से 

उतनी ही दूर है 

होंठ हंसे तो हंसे 

आँखों को 

रूलाती जरूर है, 

सपने दिखाती 

तो उसे 

तोड़ती भी है 

वहीं टूटे हुए दिलों को 

कभी जोड़ती भी है, 

इस तरह 

जिन्दगी के कई 

रंग और रूप होते हैं 

कहीं ठंडी छाँव तो 

कहीं कड़ी धूप होते हैं ,

हाँ….

इसकी शक्ल 

न तो कोई 

सूरत होती है 

फिर भी यह जिन्दगी 

बहुत खूबसूरत होती है ।

रेशमा रानी 

शिक्षिका सह कवियत्री

म.वि.बलिया  (बेगूसराय)

रूह को जलाकर कहाँ जा रहा है।

प्रस्तुति:- कुंजबिहारी शास्त्री दैनिक खोज खबर जिला संवाददाता मधेपुरा 

संकलन:- नौशाद आलम चौसा मधेपुरा

रूह को जलाकर कहाँ जा रहा है।

बेगूसराय जिला के बीहट की रहने वाली रंजना सिंह से कोई भी अपरिचित नहीं है यूं कहा जाए कर्मवीरंगाना कवियत्री ने बेगूसराय की धरती पर जन्म लिया है स्वर कोकिला शारदा सिन्हा के परिवार से आने वाली रंजना सिंह कविता में अपनी एक अलग ही पहचान बनाई है उस एरिया में कहीं भी कवि सम्मेलन हो अगर यह मौजूद न हो वह कवि सम्मेलन फीका रहता है आज हम दैनिक खोज खबर पाठकों के लिए उसकी कुछ लिखी कविता पाठकों के सामने पेश कर रहा हूं

बेवफा आशिक 

नौशाद आलम की तरफ़ से दीदी को कविता सप्रेम भेंट 

रूह को जलाकर कहाँ जा रहा है।


  ख्वाब दिल  मैं दिखाकर कहाँ जा रहा है।

तुझको चाही थीं खुद से भी ज्यादा,

फिर नजर छुपाकर कहाँ जा रहा है।

दिल मैं रखी थी इतनी हिफाजत से तुझे

दिल ये मेरा चुराकर कहाँ जा रहा है।

मैंने तुझ पे ही सिर्फ भरोसा किया है।

फिर मुँह फेरकर कहाँ जा रहा है।

तुझको मुझ पे विश्वास नहीं था अगर

घर मेरा सजाकर कहाँ जा रहा है।

आई थी नजर से नजर को मिलाने तुझसे रंजना

फिर यूं रंजना को रुलाकर कहाँ जा रहा है।

सोची थी बातें करूँगी मन 

भर कर 

फिर नजरें गिराकर कहाँ जा रहा है।

कवियत्री रंजना सिंह 

बीहट बेगूसराय 

मीडिया व साहित्य की सूचनाओं का भंडार है पत्रकारिता कोश-डॉ.सतीश पांडेय

मीडिया साहित्य की सूचनाओं का भंडार है पत्रकारिता कोश-डॉ.सतीश पांडेय

पत्रकारिता कोश के 17वेंअंक का विमोचन संपन्न

लाल बिहारी लाल

नई दिल्ली। लिम्का बुक ऑफ रिकॉर्ड्स में दर्ज भारत की प्रथम मीडिया डायरेक्टरी”पत्रकारिता कोश ” के 17वें अंक कावि मोचन यशोदा हॉल,पंडित इस्टेट,जोशीबाग,कल्याण (पश्चिम) मुंबई में संपन्न हुआ।ऊँ शिवम सत्संग ट्रस्ट एवं सोनावणे कॉलेज,कल्याणके संयुक्त तत्वावधान में आयोजित इस समारोह की अध्यक्षता के.जे.सोमैया कॉलेज के हिंदी विभागाध्यक्ष डॉ.सतीश पांडेय ने की।डॉ.सतीश पांडेय ने कहा किपत्रकारिता कोर्स  मीडिया व साहित्य की सूचनाओं का भंडार है. पत्रकारिता एवं साहित्य के क्षेत्र में बड़ी तेजीसे बदलाव आ रहा है. ऐसे में पत्रकारिता व साहित्य जगत की सूचनाओं को आम लोगों तकपहुंचाने और उन्हें एक मंच पर लाने का काम पत्रकारिता कोर्स के माध्यम से हो रहा है।समारोह में प्रमुख अतिथि के रूप में उपस्थित दै. मुंबईमित्र/वॄत्त के समूह संपादक अभिजीत राणे ने कहा कि पत्रकारों को इस समय काफी समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है ऐसे में मीडिया जगत को इकट्ठा होकर अपनी आवाज बुलंद करने की जरूरत है. इस कार्य को सरलबनाने में पत्रकारिता कोश की कड़ी का काम कर रहा है जो अत्यंत सराहनीय है।

रेलवे समाचार के संपादक सुरेश त्रिपाठी ने कहा कि यह कोश न सिर्फ लेखक-पत्रकारों केलिए उपयोगी है बल्कि यह आम लोगों के लिए भी उतनी ही लाभदायक है. नवभारत टाइम्स केठाणे ब्यूरो चीफअनिल शुक्ला ने कहा किइलेक्ट्रॉनिक मीडिया के बढ़ते क्रेज के बावजूद प्रिंट मीडिया का अपना एकअलग ही रुतबा है और इसकी प्रसार संख्या में लगतार वॄदिध हो रही है. यही वजह है किपत्रकारिता कोश की लोकप्रियता निरंतर बनी हुई है।

वरिष्ठ पत्रकार वअभिनेताअनिल थत्तेने कहा कि यह कोश अब अंतर्राष्ट्रीयस्वरूप ले चुका है और इसमें निरंतर सुधार हो रहा है. प्रजा राज्य के संपादक विष्णु कुमार चौधरी एवं वरिष्ठ पत्रकार महादेव पंजाबी नेपत्रकारिता को लोकतंत्र का चौथा स्तंभ बताते हुए देश के विकास में इसकी भूमिका पर प्रकाश डाला।के.एम.अग्रवाल कॉलेज,कल्याणके महासचिवडॉ.विजयपंडित ने अपने स्वागत वक्तव्य मेंकहा कि पत्रकारिता कोश  इतनी उपयोगी है कि अब इसका स्वरूप अंतर्राष्ट्रीय हो गया है।  इसलिए इस कोश का नाम अब गिनीज बुक में भी होना आवश्यक है. उपप्राचार्यडॉ.आर.बी.सिंहतथा हिंदीविभागाध्यक्षडॉ.मनीष मिश्रनेभी पत्रकारिता कोश को साहित्य और मीडिया का पुलबताया।टाटा मेमोरियलअस्पताल के चिकित्सा वैज्ञानिकडॉ.संजय गुप्ता ने कहा कि पत्रकारिता समाज का दर्पण होता है ऐसे में समाज को सही रास्ता दिखाने मेंपत्रकारों की अहम भूमिका होती है.राजीव गांधी हाईस्कूल,कल्याणके प्राचार्यडॉ.रमाकांत तिवारी(क्षितिज)ने कहा कि पत्रिका प्रारंभ करना आसान बात है लेकिन उसे निरंतर 17 वर्षां तक प्रकाशित करना कठिन व श्रमसाध्य कार्य है.प्रभु रामशिक्षण संस्था के संचालक दर्शनबद्री नारायण तिवारीवएम.के.एजूकेशनल एंड रिसर्च एसोसिएशनके महासचिवअमित विजय तिवारी ने पत्रकारिता कोर्स के प्रकाशन पर अपनी शुभकामनाएं व्यक्त कीं।

कार्यक्रम मेंसम्माननीयअतिथि के रूप मेंघनश्याम गुप्ता (महासचिव ,जे.बी.शाह मार्केट व्यापारी एसोसिएशन),प्रतिभाबाजपेयी(संपादक,स्टोरीमिरर),लाइफ ओके के मुख्य संपादक फिरोज एम खान,युनाइटेड महाराष्ट्र के संपादक एस.एन.दुबे,नवभारत के संवाददाता अखिलेश मिश्र,आदि उपस्थित थे।कार्यक्रम का प्रारंभ कवि व समरस चेतना के कार्यकारीसंपादक रवि यादव की सरस्वती वंदना से हुआ.तत्पश्चातसभी अतिथियों का स्वागत शॉल,पुष्पगुच्छ व स्मॄति चिह्नदेकर किया गया.संपादक आफताब आलम ने पत्रकारिता कोश के निरंतर17वें अंक के प्रकाशन पर अपने विचार प्रकट किएऔर इसकी निरंतरता बनाए रखने के लिए प्रतिबद्ध बताया।समारोह मेंसुरेंद्र मिश्रा(प्रधान संवाददाता/महाराष्ट्र ब्यूरो,अमर उजाला)तथा राज शर्मा(मुख्य संपादक,क्राइम रिपोर्टर्स टीवी न्यूज)को पत्रकारिताकोश की ओर से श्रेष्ठ सूचना ब्यूरो सम्मान प्रदान किया गया.इस अवसर परयुनाइटेड महाराष्ट्र समाचारपत्र तथाश्रीमती शारदा भास्कर शेट्टी मेमोरियल ट्रस्ट की ओर से टाटा मेमोरियल अस्पताल केचिकित्सा वैज्ञानिक डॉ.संजय गुप्ता को चिकित्सा गौरवसम्मान से नवाजा गया.कार्यक्रम का संचालन डॉ.अनंत श्रीमाली(सहा.निदेशक,कें.हिं.प्रशि.उप संस्थान,भारतसरकार)ने किया जबकि आभार प्रदर्शन पत्रकार/व्यंग्यकार/स्तंभकार राजेश विक्रांत ने किया।समारोहमेंविकलांग की पुकार के कार्यकारी संपादक सरताज मेहदी,निरंकुश कलम के संपादक जाफर शेख,अनूपम मेल केसंपादक दिनेशचंद्र बैसवारी,जनसंसार के ब्यूरो चीफनागेंद्र सिंह,शोध शक्ति के संपादक पवन तिवारी,लेखक सलाम शेख,डॉ.एस.एम.एच.रिज्वी(प्रिंस),मीडिया समाचार की संपादक विद्या पवनदुबे व हुमायूं कबीर,जानता राजा के संपादक राजारामगायकवाड़,नूतन पांडेय,कमरअंसारी,आदि सहित मुंबई,ठाणे,कल्याण व पालघर जिला के सैकड़ों लेखक,पत्रकारउपस्थित थे।

लगभग700पृष्ठों परआधारित इस अखिल भारतीय कोश  में मुंबई सहित देश के विभिन्न क्षेत्रों से प्रकाशित होने वाले विविध भाषाओंके समाचारपत्र-पत्रिकाओं/समाचार चैनलों,आदि के साथ-साथ उनमें कार्यरत लेखक-पत्रकारों/कवि-साहित्यकारों/स्वतंत्र पत्रकारों/प्रेस फोटोग्राफरों/वीडियोकैमरामैनों/प्रेस संगठनों/फीचर एजेंसियों/पत्रकारिता प्रशिक्षण संस्थानों,आदि के नाम वपतेप्रकाशित किए गए हैं।

जवाहर लाल नेहरू के128वीं जन्म दिवस पर विशेष

जवाहर लाल नेहरू के128वीं जन्म दिवस पर विशेष

(14 नवंबर,बाल दिवस के शुभ अवसर पर)

बच्चों के चाचा-जवाहर लालनेहरू

लाल बिहारी लाल

नई दिल्ली। बच्चें हर देश काभविष्यऔर उसकी तस्वीर होते हैं। बच्चे ही किसी देश के आने वाले भविष्य को तैयारकरते हैं। लेकिन भारत जैसे देश में बाल मजदूरी,बाल विवाह और बाल शोषण के तमाम ऐसेअनैतिकऔर क्रूर कृत्य मिलेंगे जिन्हें देख आपको यकीन नहीं होगा कि यह वही देश हैजहां भगवान विष्णु को बाल रूप में पूजा जाता है और जहां के प्रथमप्रधानमंत्री कोबच्चे इतने प्यारे थे कि उन्होंने अपना जन्म दिवसही उनके नाम कर दिया।

देश के प्रथमप्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू को बच्चों से विशेषप्रेम था। यह प्रेम ही था जोउन्होंने अपने जन्म दिवस को बाल दिवस के रूप में मनाने का निर्णयलिया।जवाहरलालनेहरू को बच्चों से लगाव था तो वहीं बच्चे भी उन्हें चाचा नेहरू केनाम से जानतेथे। जवाहरलाल नेहरू ने नेताओं की छवि से अलग हटकरएक ऐसी तस्वीर पैदा की जिस पर चलना आज के नेताओं के बस की बात नहीं। आज चाचा नेहरूका जन्म दिन है, तो चलिएजानतेहैं जवाहरलाल नेहरू के उस पक्ष के बारे में जोउन्हें बच्चों के बीच चाचा बनातीथी।

14नवंबर, 1889 कोउत्तर प्रदेश के इलाहाबाद में जन्मे पं. नेहरू का बचपन काफी शानो शौकतसेबीता। उनके पिता देश के उच्च वकीलों में से एक थे।पं. मोतीलाल नेहरु देश के एक जाने माने धनाढ्य वकील थे। उनकी मां का नाम स्वरूपरानी नेहरू था। वह मोतीलाल नेहरूके इकलौते पुत्र थे। इनके अलावा मोती लाल नेहरूकी तीन पुत्रियांथीं उनकी बहन विजयलक्ष्मी पंडित बाद में संयुक्तराष्ट्र महासभा की पहली महिलाअध्यक्ष बनीं।

पं. नेहरु महात्मा गांधीके कंधे से कंधा मिलाकर अंग्रेजों के खिलाफ लड़े। चाहे असहयोग आंदोलनकी बात हो याफिर नमक सत्याग्रह या फिर1942के भारत छोड़ो आंदोलन की बात हो उन्होंने गांधी जीके हर आंदोलन में बढ़-चढ़ कर भाग लिया। नेहरू की विश्व के बारे मेंजानकारी सेगांधी जी काफी प्रभावित थे और इसीलिए आजादी के बादवह उन्हें प्रधानमंत्री पद परदेखना चाहते थे। सन्1920में उन्होंने उत्तर प्रदेश के प्रतापगढ़ जिले मेंपहलेकिसान मार्च का आयोजन किया।1923में वहअखिल भारतीय कांग्रेस समिति के महासचिवचुने गए।1929में नेहरूभारतीयराष्ट्रीय कांग्रेस के लाहौर सत्र के अध्यक्ष चुने गए। नेहरू आजादी केआंदोलन के दौरान बहुत बार जेल गए।1920से1922तक चलेअसहयोग आंदोलन के दौरानउन्हें दो बार गिरफ्तार किया गया।

नेहरू जहांगांधीवादी मार्ग से आजादी के आंदोलन के लिए लड़े वहीं उन्होंने कई बारसशस्त्रसंघर्ष चलाने वाले क्रांतिकारियों का भी साथ दिया।आजाद हिन्द फौज के सेनानियों परअंग्रेजों द्वारा चलाए गए मुकदमे में नेहरू नेक्रांतिकारियों की वकालत की। उनकेप्रयासोंके चलते अंग्रेजों को बहुत से क्रांतिकारियों का रिहा करना पड़ा।27मई, 1964को उनका निधन हो गया.

बच्चों के चाचा नेहरू

एक दिन तीन मूर्तिभवन के बगीचे में लगे पेड़-पौधों के बीच से गुजरतेहुए घुमावदार रास्ते पर नेहरू जीटहल रहे थे।उनका ध्यान पौधों पर था, तभी पौधों के बीच से उन्हें एकबच्चे के रोनेकी आवाज आई. नेहरूजी ने आसपास देखा तो उन्हेंपेड़ों के बीच एक-दो माह का बच्चा दिखाई दिया जो रो रहा था।नेहरूजी ने उसकीमां को इधर-उधर ढूंढ़ा पर वह नहीं मिली। चाचा ने सोचा शायद वह बगीचेमें ही कहींमाली के साथ काम कर रही होगी।नेहरूजी यह सोच ही रहे थे कि बच्चे ने रोना तेज करदिया। इस पर उन्होंने उस बच्चे की मां की भूमिका निभाने का मन बनालिया।वह बच्चे को गोदमें उठाकर खिलाने लगे और वह तब तक उसके साथ रहे जबतक उसकी मां वहां नहीं आ गई। उसबच्चे को देश के प्रधानमंत्री के हाथ में देखकरउसकी मां को यकीन ही नहींहुआ।

दूसरा वाकया जुड़ाहै तमिलनाडु से, एक बार जब पंडित नेहरू तमिलनाडु के दौरे पर गए तब जिससड़क से वेगुजर रहे थे वहां लोग साइकलों पर खड़े होकर तो कहींदीवारों पर चढ़कर नेताजी कोनिहार रहे थे। प्रधानमंत्री की एक झलक पाने के लिएहर आदमी इतना उत्सुक था कि जिसेजहां समझ आया वहां खड़े होकर नेहरू जी को निहारनेलगा। इस भीड़ भरेइलाके में नेहरूजी ने देखा कि दूर खड़ा एक गुब्बारेवाला पंजों के बल खड़ा डगमगा रहाथा, ऐसा लग रहा था कि उसके हाथों के तरह-तरह केरंग-बिरंगी गुब्बारे मानो पंडितजीको देखनेके लिए डोल रहे हों. जैसे वे कह रहे हों हम तुम्हारा तमिलनाडु में स्वागतकरते हैं। नेहरूजी की गाड़ी जब गुब्बारे वाले तक पहुंची तो गाड़ी सेउतरकर वे गुब्बारे खरीदने के लिए आगे बढ़े तो गुब्बारे वाला हक्का-बक्का-सा रह गया।नेहरूजी नेअपने तमिल जानने वाले सचिव से कहकर सारे गुब्बारेखरीदवाए और वहां उपस्थित सारेबच्चों को वे गुब्बारे बंटवा दिए। ऐसे प्यारे चाचानेहरू को बच्चों के प्रति बहुतलगाव था। नेहरू जी के मन में बच्चों के प्रति विशेषप्रेम और सहानुभूति देखकर लोगउन्हें चाचा नेहरू के नाम से संबोधित करने लगे औरजैसे-जैसे गुब्बारे बच्चों के हाथों तक पहुंचे बच्चों ने चाचा नेहरू-चाचा नेहरू कीतेज आवाज से वहां का वातावरणउल्लासित कर दिया. तभी से वे चाचा नेहरू के नाम सेप्रसिद्ध हो गए। भारत के भारत में इस तरह के महान मानव का जन्म बहुत कम ही हो रहाहै जो देश के युवाओं एव बच्चों की सोंच रखता है और इसके चहुमुखी विकास की बात करताहो।

लाल बिहारीलाल

वरिष्ठसाहित्यकार एंव पत्रकार

फोन-9868163073/7042663073

लेखक-वरिष्ठ साहित्यकार एवं लाल कला मंच,नई दिल्ली के सचिव हैं।

​एक ह्रदयस्पर्शी कहानी: “मेरे पापा की औकात”

पाँच दिन की छूट्टियाँ बिता कर जब ससुराल पहुँची तो पति घर के सामने स्वागत में खड़े थे। 
अंदर प्रवेश किया तो छोटे से गैराज में चमचमाती गाड़ी खड़ी थी स्विफ्ट डिजायर!
मैंने आँखों ही आँखों से पति से प्रश्न किया तो उन्होंने गाड़ी की चाबियाँ थमाकर कहा:-“कल से तुम इस गाड़ी में कॉलेज जाओगी प्रोफेसर साहिबा!”
“ओह माय गॉड!!” 
ख़ुशी इतनी थी कि मुँह से और कुछ निकला ही नही। बस जोश और भावावेश में मैंने तहसीलदार साहब को एक जोरदार झप्पी देदी और अमरबेल की तरह उनसे लिपट गई। उनका गिफ्ट देने का तरीका भी अजीब हुआ करता है। 
सब कुछ चुपचाप और अचानक!! 
खुद के पास पुरानी इंडिगो है और मेरे लिए और भी महंगी खरीद लाए। 
6 साल की शादीशुदा जिंदगी में इस आदमी ने न जाने कितने गिफ्ट दिए। 

गिनती करती हूँ तो थक जाती हूँ। 

ईमानदार है रिश्वत नही लेते । मग़र खर्चीले इतने कि उधार के पैसे लाकर गिफ्ट खरीद लाते है।
लम्बी सी झप्पी के बाद मैं अलग हुई तो गाडी का निरक्षण करने लगी। मेरा फसन्दीदा कलर था। बहुत सुंदर थी। 
फिर नजर उस जगह गई जहाँ मेरी स्कूटी खड़ी रहती थी।

हठात! वो जगह तो खाली थी। 
“स्कूटी कहाँ है?” मैंने चिल्लाकर पूछा।
“बेच दी मैंने, क्या करना अब उस जुगाड़ का? पार्किंग में इतनी जगह भी नही है।”
“मुझ से बिना पूछे बेच दी तुमने??” 
“एक स्कूटी ही तो थी; पुरानी सी। गुस्सा क्यूँ होती हो?”
उसने भावहीन स्वर में कहा तो मैं चिल्ला पड़ी:-“स्कूटी नही थी वो। 
मेरी जिंदगी थी। मेरी धड़कनें बसती थी उसमें। मेरे पापा की इकलौती निशानी थी मेरे पास।
 मैं तुम्हारे तौफे का सम्मान करती हूँ मगर उस स्कूटी के बिना पे नही। मुझे नही चाहिए तुम्हारी गाड़ी। तुमने मेरी सबसे प्यारी चीज बेच दी। वो भी मुझसे बिना पूछे।'” 
मैं रो पड़ी।

शौर सुनकर मेरी सास बाहर निकल आई। 
उसने मेरे सर पर हाथ फेरा तो मेरी रुलाई और फुट पड़ी।
 “रो मत बेटा, मैंने तो इससे पहले ही कहा था।
 एक बार बहु से पूछ ले। मग़र बेटा बड़ा हो गया है।
 तहसीलदार!! माँ की बात कहाँ सुनेगा? 
मग़र तू रो मत। 
और तू खड़ा-खड़ा अब क्या देख रहा है वापस ला स्कूटी को।”

तहसीलदार साहब गर्दन झुकाकर आए मेरे पास।
 रोते हुए नही देखा था मुझे पहले कभी। 

प्यार जो बेइन्तहा करते हैं। 
याचना भरे स्वर में बोले:- सॉरी यार! मुझे क्या पता था वो स्कूटी तेरे दिल के इतनी करीब है। मैंने तो कबाड़ी को बेचा है सिर्फ सात हजार में। वो मामूली पैसे भी मेरे किस काम के थे? यूँ ही बेच दिया कि गाड़ी मिलने के बाद उसका क्या करोगी? तुम्हे ख़ुशी देनी चाही थी आँसू नही। अभी जाकर लाता हूँ। ”

फिर वो चले गए।
मैं अपने कमरे में आकर बैठ गई। जड़वत सी।
 पति का भी क्या दोष था। 
हाँ एक दो बार उन्होंने कहा था कि ऐसे बेच कर नई ले ले।
 मैंने भी हँस कर कह दिया था कि नही यही ठीक है। 

लेकिन अचानक स्कूटी न देखकर मैं बहुत ज्यादा भावुक हो गई थी। होती भी कैसे नही। 
वो स्कूटी नही #”औकात” थी मेरे पापा की। 
जब मैं कॉलेज में थी तब मेरे साथ में पढ़ने वाली एक लड़की नई स्कूटी लेकर कॉलेज आई थी। सभी सहेलियाँ उसे बधाई दे रही थी। 

तब मैंने उससे पूछ लिया:- “कितने की है?

उसने तपाक से जो उत्तर दिया उसने मेरी जान ही निकाल ली थी:-” कितने की भी हो? तेरी और तेरे पापा की औकात से बाहर की है।”
अचानक पैरों में जान नही रही थी। सब लड़कियाँ वहाँ से चली गई थी। मगर मैं वही बैठी रह गई। किसी ने मेरे हृदय का दर्द नही देखा था। मुझे कभी यह अहसास ही नही हुआ था कि वे सब मुझे अपने से अलग “गरीब”समझती थी। मगर उस दिन लगा कि मैं उनमे से नही हूँ। 

घर आई तब भी अपनी उदासी छूपा नही पाई। माँ से लिपट कर रो पड़ी थी। माँ को बताया तो माँ ने बस इतना ही कहा” छिछोरी लड़कियों पर ज्यादा ध्यान मत दे! पढ़ाई पर ध्यान दे!”

रात को पापा घर आए तब उनसे भी मैंने पूछ लिया:-“पापा हम गरीब हैं क्या?”

तब पापा ने सर पे हाथ फिराते हुए कहा था”-हम गरीब नही हैं बिटिया, बस जरासा हमारा वक़्त गरीब चल रहा है।”

फिर अगले दिन भी मैं कॉलेज नही गई। न जाने क्यों दिल नही था। शाम को पापा जल्दी ही घर आ गए थे। और जो लाए थे वो उतनी बड़ी खुशी थी मेरे लिए कि शब्दों में बयाँ नही कर सकती। एक प्यारी सी स्कूटी। तितली सी। सोन चिड़िया सी। नही, एक सफेद परी सी थी वो। मेरे सपनों की उड़ान। मेरी जान थी वो। सच कहूँ तो उस रात मुझे नींद नही आई थी। मैंने पापा को कितनी बार थैंक्यू बोला याद नही है। स्कूटी कहाँ से आई ? पैसे कहाँ से आए ये भी नही सोच सकी ज्यादा ख़ुशी में। फिर दो दिन मेरा प्रशिक्षण चला। साईकिल चलानी तो आती थी। स्कूटी भी चलानी सीख गई। 

पाँच दिन बाद कॉलेज पहुँची। अपने पापा की “औकात” के साथ। एक राजकुमारी की तरह। जैसे अभी स्वर्णजड़ित रथ से उतरी हो। सच पूछो तो मेरी जिंदगी में वो दिन ख़ुशी का सबसे बड़ा दिन था। मेरे पापा मुझे कितना चाहते हैं सबको पता चल गया। 

मग़र कुछ दिनों बाद एक सहेली ने बताया कि वो पापा के साईकिल रिक्सा पर बैठी थी। तब मैंने कहा नही यार तुम किसी और के साईकिल रिक्शा पर बैठी हो। मेरे पापा का अपना टेम्पो है।

मग़र अंदर ही अंदर मेरा दिमाग झनझना उठा था। क्या पापा ने मेरी स्कूटी के लिए टेम्पो बेच दिया था। और छः महीने से ऊपर हो गए। मुझे पता भी नही लगने दिया। 

शाम को पापा घर आए तो मैंने उन्हें गोर से देखा। आज इतने दिनों बाद फुर्सत से देखा तो जान पाई कि दुबले पतले हो गए है। वरना घ्यान से देखने का वक़्त ही नही मिलता था। रात को आते थे और सुबह अँधेरे ही चले जाते थे। टेम्पो भी दूर किसी दोस्त के घर खड़ा करके आते थे।

कैसे पता चलता बेच दिया है। 

मैं दौड़ कर उनसे लिपट गई!:-“पापा आपने ऐसा क्यूँ किया?” बस इतना ही मुख से निकला। रोना जो आ गया था।

” तू मेरा ग़ुरूर है बिटिया, तेरी आँख में आँसू देखूँ तो मैं कैसा बाप? चिंता ना कर बेचा नही है। गिरवी रखा था। इसी महीने छुड़ा लूँगा।”

“आप दुनिया के बेस्ट पापा हो। बेस्ट से भी बेस्ट।इसे सिद्ध करना जरूरी कहाँ था? मैंने स्कूटी मांगी कब थी?क्यूँ किया आपने ऐसा? छः महीने से पैरों से सवारियां ढोई आपने। ओह पापा आपने कितनी तक़लीफ़ झेली मेरे लिए ? मैं पागल कुछ समझ ही नही पाई ।” और मैं दहाड़े मार कर रोने लगी। फिर हम सब रोने लगे। मेरे दोनों छोटे भाई। मेरी मम्मी भी।

पता नही कब तक रोते रहे ।

वो स्कूटी नही थी मेरे लिए। मेरे पापा के खून से सींचा हुआ उड़नखटोला था मेरा। और उसे किसी कबाड़ी को बेच दिया। दुःख तो होगा ही।

अचानक मेरी तन्द्रा टूटी। एक जानी-पहचानी सी आवाज कानो में पड़ी। फट-फट-फट,, मेरा उड़नखटोला मेरे पति देव यानी तहसीलदार साहब चलाकर ला रहे थे। और चलाते हुए एकदम बुद्दू लग रहे थे। मगर प्यारे से बुद्दू। मुझे बेइन्तहा चाहने वाले राजकुमार बुद्दू…
✍लेखक: अज्ञात 

( साभार : प्रभाकर कुमार , सीवान  )

शिक्षक ही राष्ट्र निर्माता है, राधाकृष्णन के जन्मदिवस पर कुछ रोचक जानकारी

शिक्षक ही राष्ट्र निर्माता है, राधाकृष्णन के जन्मदिवस पर कुछ रोचक जानकारी

बचपन से किताबें पढने के शौकीन राधाकृष्णन का जन्म तमिलनाडु के तिरुतनी गॉव में 5 सितंबर 1888 को हुआ था। साधारण परिवार में जन्में राधाकृष्णन का बचपन तिरूतनी एवं तिरूपति जैसे धार्मिक स्थलों पर बीता । वह शुरू से ही पढाई-लिखाई में काफी रूचि रखते थे, उनकी प्राम्भिक शिक्षा क्रिश्चियन मिशनरी संस्था लुथर्न मिशन स्कूल में हुई और आगे की पढाई मद्रास क्रिश्चियन कॉलेज में पूरी हुई। स्कूल के दिनों में ही डॉक्टर राधाकृष्णन ने बाइबिल के महत्त्वपूर्ण अंश कंठस्थ कर लिए थे , जिसके लिए उन्हें विशिष्ट योग्यता का सम्मान दिया गया था।

कम उम्र में ही आपने स्वामी विवेकानंद और वीर सावरकर को पढा तथा उनके विचारों को आत्मसात भी किया। आपने 1902 में मैट्रिक स्तर की परीक्षा प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण की और छात्रवृत्ति भी प्राप्त की । क्रिश्चियन कॉलेज, मद्रास ने भी उनकी विशेष योग्यता के कारण छात्रवृत्ति प्रदान की। डॉ राधाकृष्णन ने 1916 में दर्शन शास्त्र में एम.ए. किया और मद्रास रेजीडेंसी कॉलेज में इसी विषय के सहायक प्राध्यापक का पद संभाला।

डॉ. राधाकृष्णन के नाम में पहले सर्वपल्ली का सम्बोधन उन्हे विरासत में मिला था। राधाकृष्णन के पूर्वज ‘सर्वपल्ली’ नामक गॉव में रहते थे और 18वीं शताब्दी के मध्य में वे तिरूतनी गॉव में बस गये। लेकिन उनके पूर्वज चाहते थे कि, उनके नाम के साथ उनके जन्मस्थल के गॉव का बोध भी सदैव रहना चाहिए। इसी कारण सभी परिजन अपने नाम के पूर्व ‘सर्वपल्ली’ धारण करने लगे थे।

« Older Entries