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प्रधानमंत्री के भाषण व ‘पप्पू’ बिहारी नाम का चरित्र पर उठ रहे है सवाल फिर भी फिल्म ‘मोदी का गांव’ को सेंसर बोर्ड की हरी झंडी

प्रधानमंत्री के भाषण व ‘पप्पू’ बिहारी नाम का चरित्र पर उठ रहे है सवाल फिर भी फिल्म ‘मोदी का गांव’ को सेंसर बोर्ड की हरी झंडी

[दैनिक खोज खबर सेन्ट्रल डेस्क:] फिल्म ‘मोदी का गांव’ अब जल्द ही रिलीज होगी। अस्पष्ट रूप से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के विकास के एजेंडे से प्रेरित इस फिल्म को आठ महीने बाद आखिरकार सेंसर बोर्ड ने अपनी मंजूरी दे दी है।

केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड (सीबीएफसी) ने फिल्म के निर्माता सुरेश के. झा को सूचित किया कि फिल्म को प्रदर्शित करने की अनुमति प्रदान की गई है। इस खबर से प्रसन्नचित झा ने कहा कि ‘यह हमारे के लिए बड़ी जीत है। फिल्म प्रमाणन अपीलीय अधिकरण (एफसीएटी) ने सीबीएफसी की ओर से उठाए गए आपत्तिजनक बिंदुओं को दबा दिया है और हमलोग अब दिसंबर के मध्य तक पूरे भारत में फिल्म का प्रदर्शन करने पर विचार कर रह हैं।’

फरवरी में सीबीएफसी के तत्कालीन चेरयमैन पहलाज निहलाणी ने विविध मसलों को आधार बनाकर फिल्म को बोर्ड का प्रमाण पत्र देने से इनकार कर दिया था।

उन्होंने झा को बोर्ड का प्रमाणपत्र से पहले प्रधानमंत्री कार्यालय (पीएमओ) व चुनाव आयोग से अनापत्ति प्रमाणपत्र प्राप्त करने को कहा था। निहलाणी ने फिल्म में मोदी से मिलते-जुलते पात्र की ओर से पाकिस्तान की तरफ से उड़ी पर हुए हमले के संदर्भ में प्रधानमंत्री के भाषण व ‘पप्पू’ बिहारी नाम का चरित्र आदि को लेकर फिल्म को मंजूरी देने में अपनी अनिच्छा जाहिर की थी।

भोजपुरीकी ‘मैना’- मैनावती देवी मौन हो गई

भोजपुरीकी ‘मैना’- मैनावती देवी मौन हो गई

[लाल बिहारी लाल{

नई दिल्लीभोजपुरी कोपहचान दिलाने वाली, लोकगीतोंसे सामाजिक जीवन को मानव पटल पर उतारने वाली लोकगायिका मैनावती देवी श्रीवास्तव का जन्म बिहार के सिवान जिले की पचरूखी में 1मई 1940 को हुई थी। पर उन्होनें अपनी कर्मभूमि गोरखपुर को बनायी। उन्होनेंलोकगायन की शुरूआत गोरखपुर से सन् 1974 में आकाशवाणी गोरखपुरकी शुरूआत के साथ की। आकाशवाणी गोरखपुर की शुरूआत मैनावती देवी श्रीवास्तव केगीतों से ही हुई। उनके गीतों के बाद से ही भोजपुरी संस्कृति को एक अलग पहचान मिली।उन्होने लोक गीतों के संरक्षण ,संवर्धन एंव प्रचार प्रसार पर काफी काम किया।उन्होंनेलोकपरंपरा के संस्कार गीतों को पिरोने का काम बा-खूबी किया।लोकपरंपरा में भारतीय सामाजिक परिवेश में रहन-सहन, जीवन-मरणसे लेकर हर परिवेश को उन्होने बड़ी ही कुशलता से अपनी रचनाओं में भी उकेरा है। वहकवियत्री और लेखिका भी थी। प्रयाग संगीत समिति से संगीत प्रभाकर की डिग्री ली थी।म्यूजिक कंपोजर के रूप में आकाशवाणी में काम किया। साथ ही दूरदर्शन में भी उन्होनेअपना अमूल्य योगदान दिया। इनकी गायिकी के विरासत को इनके पुत्र राकेश श्रीवास्तवभी आज देश दुनिया में बढ़ा रहे है।

श्रीमती नैना देवी के प्रकाशित पुस्तको में 1977 में गांव के दो गीत(भोजपुरी गीत), श्री सरस्वतीचालीसा, श्रीचित्रगुप्त चालीसा, पपिहा सेवाती(भोजपुरी गीत), पुरखनके थाती(भोजपुरी पारंपरिक गीत), तथा अप्रकाशित पुस्तकों में कचरस(भोजपुरीगीत),याद करे तेरी मैना(इछहदी गीत), चोर के दाढ़ी में तिनका (कविता)औरबे घरनी घर भूत के डेरा(कहानी) जैसे अनमोल गीत समाज को दिया। सन् 1974 सेलोकगायन की शुरूआत करने वाली मैनावती देवी को पहला सम्मान सन् 1981 मेंलोक कलाकार भिखारी ठाकुर के 94वें जन्मदिवस के अवसर परबिहारमें “भोजपुरी लोक साधिका” का सम्मान मिला। उसके बाद सन् 1994 मेंअखिल भारतीय भोजपुरी परिषद लखनऊ द्वारा “भोजपुरी शिरोमणि” का सम्मानठुमरी गायिका गिरजा देवी के हाथों प्राप्त किया था। इसके बाद उन्हे अनेकों सम्मानप्राप्त किया उनमें भोजपुरी रत्न सम्मान, 2001 में भोजपूरी भूषण सम्मान , 2005 में नवरत्न सम्मान, 2006 में 2012 मेंलोकनायकभिखारी ठाकुर सम्मान, लाइफ टाइम एचिवमेन्ट अवार्डतथा गोरखपुर गौरव जैसे सम्मान से नवाजा गया। उन्हे कोई राजकीय सम्मान नहीं मिलाफिर भी भोजपुरी की सेवा में रात दिन अंतिम सांस तक लगी रही। ऐसे महान भोजपुरी सेवी को शत शत नमन है।

लेखक-भोजपुरी के जाने माने गीतकार है।

फोन –7042663073

​♨”लिप्स्टिक अंडर माय बुर्क़ा” पुरुषवादी पाबंदी का प्रतिकार या कामेच्छा का भौंडपूर्ण प्रदर्शन

​♨”लिप्स्टिक अंडर माय बुर्क़ा” पुरुषवादी पाबंदी का प्रतिकार या कामेच्छा का भौंडपूर्ण प्रदर्शन

✍ “दैनिक खोज खबर” के लिए प्रशांत रंजन :-तेज आवाज में बीजली कड़कने से भारी बारिश का अंदेशा होता है, लेकिन जरुरी नहीं भारी बारिश हो ही जाए। ’लिप्स्टिक अंडर माय बुर्का’ के साथ भी यही हुआ। इसके रिलीज के पहले जितना बड़ा तूफान खड़ा हुआ था (अथवा किया गया था), इसके रिलीज के बाद यह वैसी चित्कार करने वाली फिल्म साबित नहीं हुई। कुछ ऐसा ही ’उड़ता पंजाब’ के साथ भी हुआ था।

खैर, अब फिल्म पर आते हैं। ’लिप्स्टिक अंडर माय बुर्का’ चार महिलाओं की कहानी कहती है, जो पुरुषवादी सामाज के पाबंदियों को तोड़कर खुली हवा में सांस लेना चाहती हैं और वे ऐसा करती भी हैं। एक नजर में इस फिल्म को सराहा जा सकता है कि यह फिल्म महिला सशक्तीकरण की वकालत करती है। लेकिन ठहरिए, यह अधूरी बात हुई। नवोदित निर्देशक अलंकृता श्रीवास्तव अपने फिल्म के दर्शन को लेकर स्पष्ट नहीं दिखतीं हैं। इसको समझने के लिए फिल्म के चारों केन्द्रीय पात्र के बारे में थोड़ी चर्चा करनी होगी। फिल्म के दो प्रमुख किरदार शिरीन आलम (कोकणा सेन शर्मा) और रिहाना (प्लबीता बोरठाकुर) खुलकर जीना चाहती हैं क्योंकि उनपर पुरुषवादी पांबदियां हैं, खासकर शिरीन पर। अन्य दो किरदार बुआ जी (रत्ना पाठक शाह) और लीला (आहना कुमरा) सामाजिक मर्यादाओं को दरकिनार कर अपनी इच्छाओं को पुरा करने के लिए जतन करती हैं।

अब मोटे तौर पर देखा जाए तो फिल्म में यही दिखता है कि चारों महिलाएं अपनी आजादी के लिए संघर्ष कर रही हैं, लेकिन जब हर किरदार के परत को को सूक्ष्मता से कुरेदने पर पता चलता है कि शिरीन व रिहाना का पात्र पुरुषवादी वर्चस्व वाले समाज में महिलाओं पर पुरुषों के सुविधा के लिए थोपे गए पाबंदियों से परेशान हैं। ये ऐसी पाबंदियां हैं जिन्हें तथाकथित मर्यादा के नाम पर थोपा गया है। मर्यादा के इन बेड़ियों से परे जाकर वे दोनों अपनी जिंदनी जी लेना चाहती हैं। नई-नई काॅलेज जाने वाली व पाश्चात्य संगीत की दिवानी रिहाना तो फिर भी थोड़ी राहत में हैं। भारत के आम मध्यमवर्गीय मुस्लिम परिवार के पारंपरिक तौर-तरीकों के दायरे में उसे रहना पड़ता है। फिर भी वह अपनी ख्वाहिशें येन केन प्रकारेण पूरी कर लेती हैं। असल में पुरुषवादी वर्चस्व की शिकार तो रिहाना भी है, भले ही शिरीन की तरह क्रूर रुप में नहीं। लेकिन शिरीन का क्या। उसका सउदी रिटर्न शौहर तो उसको इंसान मानकर भी सम्मान देने के पक्ष में नहीं है। उसे अपने मर्द होने गुरुर है। खुद बेरोजगार रहते हुए भी वह अपनी बीवी को कमाते हुए नहीं देख सकता क्योंकि बीवी उसके लिए महज एक उपभोग किए जाने वाली वस्तु भर है। भले वह खुद अपनी बीवी के रहते हुए किसी दूसरी औरत से इश्क फरमाये। शिरीन के बेहतर काम करने पर उसकी कंपनी उसे पुरस्कार देती है, यह बात उसके शौहर को नागवार गुजरता है और वह अपने पुरुषवादी तरीके से उसको सजा देता है। शिरीन का गुनाह बस इतना है कि वह एक औरत है जो अपने शौहर का सम्मान करती है। शिरीन की सिसक देखकर आपको मर्द जात से घृणा हो सकती है, बशर्ते कि आप मनुष्य होकर फिल्म देखिए, पुरुष या स्त्री होकर नहीं। इन दोनों पात्रों का सटीक प्रस्तुतीकरण, निर्देशक की सफलता है। इन दोनों को देखते हुए आपको लीना यादव की ’पच्र्ड’ की याद आ सकती है। अगर इन दोनों किरदार के इर्द-गिर्द ही फिल्म की पुरी कथानक बुनी जाती, तो महिला सशक्तीकरण के मुद्दे पर यह एक विश्वस्तरीय फिल्म हो सकती थी, लेकिन ऐसा न हो सका क्योंकि इन दो किरदारों की मासूमियत पर अन्य दो किरदारों ने पानी फेर दिया।

  जिंदगी के पचास वसंत देख चुकीं बुआ जी हवाई महल नाम के पुरानी हवेली की मालकिन हैं, जो उसे किसी मंत्रालय की भांति संचालित करती हैं। हवेली में रहने वाले लोग बुआजी के हर आदेश का पालन करते हैं। व्यस्क साहित्य पढ़ते-पढ़ते बुआजी को आपना बीता हुआ यौवन याद आता है। तैरीकी प्रशिक्षक द्वारा नाम पूछे जाने पर बुआजी सोचकर, यादकर, संभलकर अपना नाम उषा परमार बताती हैं, मानो मुद्दतों हो गए किसी ने उनको उनके नाम से पुकारा ही नहीं। सबके लिए वे बुआजी ही थीं। यहाँ पर आपकेा बुआजी से सहानुभूति हो सकती है। लेकिन उसके अतिरिक्त बुआजी ने जो किया वो महज दैहिक उत्कंठाओं की पूर्ति का प्रयास भर है।

फिल्म की चैथी किरदार लीला एक छायाकार से प्रेम करती है, लेकिन उसकी मां उसकी शादी कहीं और ठीक कर देती है। अपने पंसद के लड़के से प्रेम अथवा शादी करना कतई बुरा नहीं है, लेकिन लीला के मामले में प्रेम का अर्थ है कभी भी कहीं भी कैसे भी कामेच्छा की पूर्ति। लीला अपना एमएमएस वीडियो खुद बना लेती है, कि अगर उसके प्रेमी ने धोखा दिया, तो वह एमएमएस को सोशल मीडिया पर डाल देगी। अब इसे इच्छाओं या आवश्यकताओं का अतिरेक नही ंतो और क्या कहेंगे।

मानव का जब से धरती पर अस्तित्व है, तब से ही यह बात स्थापित है कि शरीर के लिए भूख, नींद एवं मैथून आवश्यक है। प्राचीनकाल से जब सभ्यताएं अपना रुप लेने लगीं, तो एक समाज अस्तित्व में आया। इस समाज ने अपने लिए कुछ कायदे-कानून बनाए, जो अनुशासित जीवनशैली के लिए जरुरी था। इन तीन जरुरतों को भी सामाजिक जीवनशैली की कसौटी पर रखा गया, ताकि लंबे काल तक आपसी सामंजस्य से जीवन चल सके। इस सामंजस्य को ही ठोस रुप देने के लिए विवाह संस्था को महत्वपूर्ण माना गया। अपने इन अनुशासित जीवनषैली के कारण स्तनपायी होते हुए भी मनुष्यों ने खुद के लिए सामाजिक प्राणाी का दर्जा हासिल किया, क्योंकि मनुष्य नें खुद के अंदर पाशविक प्रवृति होते हुए भी अपने लिए मर्यादा तय की।

और लीला का किरदार क्या कर रहा है। महज आजादी के नाम पर पशुवत व्यवहार को महिमामंडित किया जा रहा है। प्राचीन कामसूत्र से लेकर आधुनिक विज्ञान मानता है कि पुरुषों के विपरित महिलाओं की काम प्रवृति सुसुप्तावस्था (पैसिव मोड) में होती है। लेकिन लीला? उसमें कामेच्छा का इतना अतिरेक है कि एक जगह उसका प्रेमी उसे झिड़क देता है। दूसरी जगह उसका मंगेतर उसे मना करता है। ’लिप्स्टिक अंडर माय बुर्का’ की लीला महिलाओं के कौन से वर्ग का प्रतिनिधित्व कर रही है। समाज पुरुषों को कामपिपासु मानता है। इस कारण पुरुष की निंदा भी होती है। जिस प्रवृति को पुरुष में अवगुण माना गया, उस अवगुण को महिला के मामले में कैसे जस्टीफाई किया जा सकता है। कम से कम महज आजादी के नाम पर तो नहीं। स्वतंत्रता व स्वछंदता में अंतर होता है और यह बात महिला व पुरुष दोनों पर समान रुप से लागू होती है। सिर्फ आजादी या महिला सशक्जीकरण के नाम पर किसी भी प्रकार के पाश्विक प्रवृति का महिमामंडन नहीं किया जा सकता।

इस फिल्म के निर्माता प्रकाश झा एक मंजे हुए फिल्मकार हैं। उनका व्यापक अनुभव इस फिल्म को प्रोडक्शन वैल्यू के स्तर पर समृ़द्ध बनाता है। किरदारों के परिधान, सेट डिजाइन, प्रकाश सबकुछ कथानक के अनुरुप है। झा अपनी फिल्मों की शूटिंग भोपाल में सेट लगाकर करते हैं। इस बार उन्होंने दर्शकों को रियल भोपाल का दर्शन गुणात्मक ढंग से कराया है। कास्टिंग पर भी ध्यान दिया गया है। इसलिए सुशांत सिंह, वैभव टटवाडी के अलावा छोटे से छोटे किरदार भी वास्तविक लगते हैं। सबकुछ अच्छा होते हुए भी एक साथ चार किरदार कि कहानी को आगे बढ़ाने में निर्देशन में बिखराव नजर आता है, इसलिए कहीं-कहीं यह फिल्म होम वीडियो की तरह लगती है।

’लिप्स्टिक अंडर माय बुर्का’ किरदार रचना के स्तर पर दो फाड़ में विभाजित दिखती है। इस कारण यह फिल्म एक विश्वस्तरीय फिल्म बनते-बनते चुक गयी।

✍DKK MEDIA के लिए श्रीनारद इंस्टिट्यूट फॉर मीडिया सर्विसेज एंड सोशल वर्क द्वारा प्रसारित

​♨फिल्म समीक्षा::जज्बात के जाल में “जग्गा जासूस”

✍प्रशांत रंजन☎09835758378
🌟कभी-कभी ऐसा होता है कि आप कोई स्वादिष्ट व्यंजन बनाने के लिए लंबे समय तक कई जतन करते हैं, उसकी सारी शर्तों को पुरा करते हैं, लेकिन अंततः चुल्हे से उतरने के बाद वह व्यंजन लोगों को स्वादिष्ट नहीं लगता। आपके व्यंजन की तारीफ नहीं होती। भले ही आप एक शानदार बावर्ची क्यों न हों। प्रतिभवान फिल्मकार अनुराग बसु की हालिया फिल्म ’जग्गा जासूस’ ऐसी ही है। चार साल से अधिक समय तक यह फिल्म निर्माणाधीन रही। शूटिंग के बाद कई रिशूटिंग, रिशेड्यूलिंग के बाद फिल्म पुरी हुई। इस दौरान बीच-बीच में फिल्म के डब्बाबंद हो जाने की अफवाहें भी उड़ती रहीं। रणबीर-कैटरीना के व्यक्तिगत रिश्तों के बदलते समीकरण, अनुराग-रणबीर के बीच फिल्म को लेकर तनातनी। स्मरण रहे अनुराग-रणबीर इस फिल्म के सह-निर्माता भी हैं। तीन बार रिलीज तारीख में बदलाव। इन सब के बाद भी दर्शकों को बेसब्री से ’जग्गा जासूस’ का इंतजार था, क्योंकि यही अनुराग-रणबीर की जोड़ी चार साल पहले सिने प्रेमियों को फिल्म ’बर्फी’ की मीठी सौगात दी थी। बर्फी में अनराुग ने बाॅलीवुड के बने फाॅर्मूले को तोड़ते हुए एक विलक्षण फिल्म रची थी। इसकी सफलता से उत्साहित होकर ही उन्होंने ’जग्गा जासूस’ को म्यूजिकल ड्रामे के रुप में रचा लेकिन अनजाने में हुई चूक की वहज से यह दर्शकों के गले नहीं उतरी। 
मर्डर, गैंग्स्टर, लाइफ इन ए मेट्रो जैसी सख्त, खुरदुरा, रियलिस्टिक फिल्में बनाने वाले साहसी व विवेकशील निर्देशक अनुराग बसु ने बर्फी से अपनी गियर बदली और सिनेमा माध्यम का खूबसूरत उपयोग करते हुए एक अलहदा फिल्म रच डाली। ’जग्गा जासूस’ भी उसी रास्ते पर जा रही थी, लेकिन भटक गईं। कहाँ? इसका उत्तर आगे मिलेगा। दरअसल, ’जग्गा जासूस’ की खासियत ही उसकी खामी बन गई। अनुराग ने तो अपनी सिनेमाई दृष्टि को वृहद करते हुए यूरोपियन म्यूजिकल ओपेरा की तर्ज पर फिल्म के पुरे कथानक को संगीतनुमा बना दिया। भारतीय सिनेमा के कायनात में संगीत की एक नपी-तुली परिभाषा है और उसी की परिधी में रहकर किसी फिल्म के लिए संगीत रचा जाता रहा है। अनुराग उस परिधी से परे जाकर कुछ अलग करने की सोची और संवाद को गानों के शक्ल में प्रस्तुत किया। संगीतकार प्रीतम ने संभवतः अपने करिअर में इस तरह का यह पहला काम किया होगा। एक फिल्म में छोटे-बड़े करीब ढ़ाई दर्जन गानें। चार गानों को छोड़ दें, तो बाकि गाने संवाद अदायगी के रुप में सामने आतें हैं। पंचलाइन वाले डायलाॅग पसंद करने वाले हिन्दी सिने प्रेमी को यह बात रास नहीं आयी। पूरी फिल्म के दौरान या तो जग्गा तुतलाता है या फिर गाता है। स्पष्ट डायलाॅग उसके खाते में नहीं हैं। ंलेकिन यह अनुराग की चूक नहीं है, क्योंकि यह एक प्रयोग था। असल चूक हुई पटकथा को लेकर। 
कबीर की पंक्ति है- दो पाटन के बीच में साबूत बचा न कोय…। दो ध्रुव को एक साथ साधने के चक्कर में अनुराग उलझ गए। कहानी का मुद्दा गंभीर चुन लिया। 1995 में हुए पुरुलिया आम्र्स ड्राॅप की पृष्ठभूमि में एक जासूसी कथा तैयार की और उसको बाल काॅमिक्स के अंदाज में प्रस्तुत कर दिया। प्रयोग किया इसकी तारीफ होनी चाहिए, लेकिन इस विचित्र प्रयोग ने पटकथा को खिचड़ी बना डाला। ’बर्फी’ जैसी स्पष्टता वे ’जग्गा जासूस’ में नहीं दिखा सके। इसको ऐसे समझा जा सकता है। एक तो कि कोई भी जासूसी कथा रोमांच, रहस्य, तर्क, तीक्ष्णता, तथा यथार्थवादी नजरिए पर आधारित होती है, क्योंकि ये सारे उस जासूसी कथा के आधार तत्व होते हैं। ’जग्गा जासूस’ में थोड़ा सा रहस्य था लेकिन बाकी सारे तत्व नदारद थे। दूसरा ये कि जासूसी कहानी को बाल काॅमिक्स के अंदाज में प्रस्तुत करने के पीछे निर्देशक की सोच थी, कि इससे उनकी फिल्म हास्य से भरपूर, रोचक बन जाएगी, जिसे बच्चे और बड़े दोनों पसंद करेंगे। यहीं गड़बड़ हो गई। अंतरराष्ट्रीय हथियार व्यापार जैसे गंभीर मुद्दे पर आधारित कहानी के बचकाना प्रस्तुतीकरण ने एक जासूसी कहानी के सारे मानदण्ड धवस्त कर दिए। अव्वल में बिना किसी ठोस तर्क के कहानी कही जा रही है, तिस पर भी उसकी बाल अंदाज में हुई प्रस्तुती ने फिल्म देखने का मजा किरकिरा कर दिया। परिणाम हुआ कि जटिल कथा-परत के कारण यह फिल्म न बच्चों को भायी और बचकाने प्रस्तुततीकरण के कारण न बड़ों को आकर्षित कर सकी।  
“जग्गा जासूस” में फिर अच्छा क्या है। रणबीर का अनोखा अभिनय प्रशंसनीय है। कैटरीना कैफ तो फिल्म में महज रणबीर की सह कलाकार भर हैं। पूरी फिल्म में कैटरीना कहीं से भी पत्रकार नजर नहीं आती हैं, जो कि उनका किरदार है। दूसरी अच्छी बात है फिल्म का आर्ट डायरेक्शन। परिजात पोद्दार ने मन मोहने वाले सेट डिजाइन किए हैं, जिसे एस. रवि ने करीने शूट किया है। मणिपुर के खूबसूरत लोकेशन पर फिल्माए गए दृश्य देखने लायक हैं। यूं भी हिन्दी फिल्मों में पूर्वोत्तर भारत को बहुत कम दिखाया गया है। ’जग्गा जासूस’ में यह एक अच्छा प्रयास है। गीतकार अमिताभ भट्टाचार्य की विशेष प्रशंसा होनी चाहिए। उन्होंने कवितानुमा, तुकबंदी वाले संवाद लिखे हैं, जो संवाद लेखन की दुनिया में विलक्षण कार्य है। और यह महज तुकबंदी नहीं हैं, बल्कि उन संवादों के बल पर पटकथा आगे बढ़ती है और रहस्य के परतें खुलती हैं। लेकिन ये सब एकाध चीजें हैं, जो टुकड़ों में अच्छी लगती हैं। सत्य यही है कि संपूर्णता में यह फिल्म दर्शकों को बांध नहीं पाती। 
इन कमियों के बावजूद फिल्म को दिलचस्प बनाया जा सकता था, अगर संपादन चुस्त किया जाता। ढ़ाई घण्टे से भी लंबी फिल्म है, जिसके अधिकर हिस्से में गाने हैं। जो गाना कथा को विस्तार नहीं दे पा रहा, उसे हटाया जाता। साथ ही हाॅस्टल एवं विदेश के कई दृश्य ऐसे हैं जिनकी लंबाई घटाई जा सकती थी। दो-तीन दृश्यों को तो हटाया भी जा सकता था। 
जो भी हो, किसी फिल्म का पसंद आना या न आना व्यक्तिगत मामला है, लेकिन इतना अवश्य कहा जा सकता है कि ’जग्गा जासूस’ के माध्यम से अनुराग ने एक साहसिक प्रयोग किया है। एक नपे-तुले परिधी में रहकर जज्बातों की फसल काटने वाले व्यवसायिक हिन्दी सिनेमा ने अपने पारंपरिक दर्शकों को भी जज्बाती बना दिया है। फिल्मकार खुद इससे अछूते नहीं हैं। यह भाव अनुराग जैसे विवेकशील निर्देशक के अंतर्मन में भी समाया हुआ है। अनुराग के मस्तिष्क में विवेक एवं जज्बात के द्वंद्व का परिणाम है “जग्गा जासूस”। 

                            

​🔴अब  प्रशांत रंजन “दैनिक खोज खबर” के लिए  नियमित रूप से फिल्म समीक्षा लिखेंगे 

✍दैनिक खोज खबर सेन्ट्रल डेस्क 

🚫आॅन-लाइन हिन्दी न्यूज वेबपोर्टल “दैनिक खोज खबर ” के सभी पाठकों को हम सहर्ष सूचित कर रहे है कि आज से आपके वेबपोर्टल के साथ एक नया आयाम जुड़ रहा है ।
अब  “दैनिक खोज खबर ” के लिए नियमित रूप से फिल्म समीक्षा हमारे नए साथी प्रशांत रंजन जी लिखेंगे ।

श्री प्रशांत रंजन जी विगत दस वर्षों से सिने सोसायटी आंदोलन में सक्रीय हैं।अब तक रांग नंबर, प्रोजेक्ट क्लीन इंडिया, नैशनल इमरजेंसी समेत कई अन्य लघु फिल्में एवं वृत्तवित्र का निर्देशन कर चुके है ।वर्तमान में पाटलिपुत्र सिने सोसायटी, पटना के  समन्वयक है ।

आप नियमित रूप से कई पत्र- पत्रिकाओं के लिए फिल्म समीक्षा लिखते है । आपका संपर्क नंबर- 9835758378 है ।