सेन साहब का स्वागत; सारण के नए डीएम के समक्ष अवसर भी, चुनौतियां भी !

सेन साहब का स्वागत; सारण के नए डीएम के समक्ष अवसर भी, चुनौतियां भी !

अतिथि संपादक संजय कुमार सिंह की कलम से

सारण के नए डीएम के तौर पर मंगलवार को यूपीएससी 2013 बैच के तेजतर्रार अधिकारी सुब्रत कुमार सेन ने अपना योगदान दिया। सेन साहब के लिए सारण नया नहीं है। यहां के लोगों के लिए यह गर्व की बात है कि प्रशिक्षु आईएएस के रूप में 2015 में सारण में ही उन्होंने कार्य किया है।

इस दौरान उन्हें यहाँ के लोगों की जरूरतों को समझने के अलावा जनप्रतिनिधियों, मीडियाकर्मियों के साथ साथ यहाँ की मिट्टी को परखने का भी मौका मिला होगा। जो उन्हें अब बतौर डीएम कार्य करने में काम आ सकता है। पहले हम बात करते हैं अवसर की। सारण में कई ऐसे बड़े काम हैं, जिनको अमली जामा पहना कर सेन साहब सारण के लोगों के दिलों पर अपना अमिट छाप छोड़ सकते हैं। वैसे काम तो बहुत है लेकिन हम यहां कुछ बड़े कार्यों का ही जिक्र करेंगें। पहला मंडल कारा को शहर से बाहर शिफ्ट करना। यह छोटा काम नहीं है लेकिन असंभव भी नहीं है। करीब दो ढाई दशक पहले ही तत्कालीन डीएम ने मंडल कारा को शहर से बाहर ले जाने की योजना बनाई थी। इसके लिए जमीन भी चिन्हित करने का काम शुरू हुआ था। परन्तु किन्हीं कारणों से यह योजना मूर्त रूप नहीं ले सकी। दूसरा काम है स्थायी बस स्टैंड का निर्माण। सम्भवतः छपरा पहला ऐसा परमण्डलीय मुख्यालय है,जहाँ स्थायी बस स्टैंड नहीं है। सड़कों पर ही प्रमुख स्टैंड है। इसके लिए भी योजना बनी, जो बाबुओं की फ़ाइल में धूल फांक रही होगी। इसके अतिरिक्त बायपास रोड को जल्द चालू कराकर जाम से रोज कराहते छपरा शहर को राहत देने, जैसे कार्य शायद आप ही के जैसे डीएम का इंतजार कर रहे हैं। इन सब कार्यों को पूरा कर नए डीएम का शुमार भी आरके श्रीवास्तव, ब्यास जी, प्रत्यय अमृत जैसे सारण के डीएम के रूप होने लगेगी। इन तीनों का नाम सारण के लोगों के दिलों में आज भी बसा हुआ है। इन तीनों के जाने के बाद करीब डेढ़ दर्जन डीएम आए और गए, परन्तु शायद ही किसी को कोई याद रखा हो। हाँ, हाल के दिनों में एक डीएम साहब ऐसे आए थे।

जिनकी चर्चा तेज तर्रार, कड़क, निडर अधिकारी के रूप में होनी शुरू हुई थी लेकिन अन्तिम समय में लोगों में उनकी चर्चा खास वजहों से होने लगी। हम यहाँ बात उनकी नहीं कर रहे हैं, जिनके यहाँ निगरानी ने छापा मारा था। उनकी कर रहे हैं, जो डीएम से सीधे इसी जिले के मंत्री जी के ओएसडी बन गए। छपरा के अधिकतर लोग इसे पचा नहीं पा रहे थे।
अब बात थोड़ी चुनौतियों की। किसी भी डीएम की राह आसान नहीं होती। चुनौतियों से भरी यह कुर्सी है। हाँ, जिला अगर पहले से विकास के मार्ग पर अग्रसर हो और योजनाओं का क्रियान्वयन पारदर्शी तरीके से हो रहा हो तो राह आसान जरूर हो जाती। परन्तु सारण में फिलहाल ऐसा कुछ भी नहीं है। मुख्यमंत्री की महत्वाकांक्षी योजना सात निश्चित दम तोड़ रही है।

शिक्षा व स्वास्थ्य जैसी बुनियादी ढांचे भी बेपटरी है। मास्टर साहब न स्कूल में मिलेंगें और न ही डॉक्टर साहब अस्पताल में। मनरेगा योजना संबंधित अधिकारियों व मुखियों के लिए कामधेनु बनी हुई है। राशन किरासन के लिए गरीब रोज सड़क पर उतरते हैं। तीन महीने में एक बार राशन किरासन वितरण होने की शिकायतें आम हो गईं हैं। शौचालय निर्माण की प्रगति भी कागजो में ज्यादा है। कई जगहों से शिकायतें हैं कि कागजों में ही शौचालय निर्माण कर, सम्बंधित वार्ड या पंचायत को खुले में शौच से मुक्त यानी ओडीएफ घोषित कर दिया गया है। इसके अलावा जिले में बाढ़-सुखाड़ की स्थाई समस्या है ही। बहरहाल, नए डीएम के पास अवसर व चुनौती दोनों है। उम्मीद है वे चुनौतियों का डटकर मुकाबला करेंगें। वे पूरी तरह सक्षम भी हैं। हम सब की शुभकामनाएं उनके साथ है।

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