मानवता की  दुश्मन है चतुष्वर्णीय व्यवस्था

​(अम्बेडकर निर्वाण दिवस पर विशेष)

मानवता की  दुश्मन है चतुष्वर्णीय व्यवस्था

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प्रदीप सारंग बाराबकी (उत्तर प्रदेश )

            जिस प्रकार किसी भी वर्तमान प्रशासनिक व्यवस्था को चुस्त-दुरुस्त रूप देने के लिए कार्य-दायित्वों का विभाजन करने हेतु राजकाज में लगे कर्मचारियों की प्रथम, द्वितीय, तृतीय, और चतुर्थ श्रेणी बनायी गयी उसी प्रकार तत्समय के जिम्मेदारों द्वारा समाज को सुचारु स्वरूप देने के लिए चतुष्वर्णीय व्यवस्था बनाई गई। कोई कह सकता है कि चतुष्वर्णीय व्यवस्था के प्रभाव से ही वर्तमान प्रशासनिक कर्मचारियों की चार श्रेणी बनाई गई हैं। तो भी कार्य दायित्व की दृष्टि से वर्ग या श्रेणी विभाजन गैरजरूरी नहीं है और असहमति भी नहीं है। असहमति इस बुराई पर है कि सफाई कर्मचारी का बेटा सफाई कर्मचारी ही हो और क्लर्क का बेटा क्लर्क। ये बुराई चतुष्वर्णीय व्यवस्था की विशेषता है जो असहमति का कारण है। इस व्यवस्था की दूसरी विशेषता ये है कि जबरदस्त छुआछूत। जो वर्तमान में एक सामाजिक बुराई है। डॉ अंबेडकर को इसी छुआछूत के चलते स्कूल के बाहर से खिड़की के पास बैठकर शिक्षार्जन करना पड़ा।

तीसरी विशेषता यह कि कर्म और योग्यता में साम्य होते हुए भी एक दूसरे को सामाजिक बराबरी का सम्मान न देना। चतुष्वर्णीय व्यवस्था की इसी विशेषता के कारण शम्बूक का वध हुआ। एकलब्य का अंगूठा कटा। आज के दौर में ये भी बुराई ही है। चौथी विशेषता ये कि उँच-नीच अथवा कुलीन और हेय भाव बनाये रखना।

यही सब कारण हैं जिससे मैं कह सकता हूँ कि चतुष्वर्णीय व्यवस्था, मानवता की दुश्मन है।  इस चतुष्वर्णीय व्यवस्था को समाप्त किये बिना समता, समानता आधारित समाज की रचना सम्भव ही नहीं है। कुछ लोग इस प्रकरण में अनावश्यक रूप से ब्राम्हणों को लाते हैं, ये भी संकुचित सोच एवं प्रतिकार-भाव का प्रभाव है। ब्राह्मण भी हमारे समाज के जरूरी हिस्सा हैं किन्तु ब्राह्मणवाद समाज के लिए घातक है। ब्राह्मण भी मानव हैं, इनका भी बुद्धिमत्ता और विवेकशीलता पूर्ण योगदान, समाज और राष्ट्र के नव निर्माण में जरूरी है। किन्तु जब जन्म आधारित विशेष दर्जा/सम्मान की कामना, समाज से करते हैं तो ब्राम्हणवाद के पोषक बन जाते हैं। “पूजिय विप्र सकल गुण हीना। पूजि न गुनगन ज्ञान-प्रवीना” की मान्यता और स्थिति, भी गैर बराबरी को स्थापित करने वाली है, जो मानवता की दुश्मन है। यानि जन्म आधारित नहीं बल्कि कर्म और योग्यता आधारित सम्मान की व्यवस्था ही मानवतावादी समाज का निर्माण करेगा।

महान साहित्यकार पं हजारी प्रसाद द्विवेदी जी अपने ही गाँव के एक अनुसूचित जाति के व्यक्ति को सर्पदंश से अचानक घोर संकट में पड़ गया जानकर अपना जनेऊ निकालकर उसके पैर में बाँध देते हैं। पं राहुल सांकृत्यायन का लेखन अनेकानेक रूढ़ियों और संकुचित मान्यताओं का तोड़क एवं समाज के लिए नव-प्रकाश-दायक है।

इसलिए ब्राह्मण नहीं ब्राह्मणवाद मानवता का दुश्मन है।

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