​♨फिल्म समीक्षा::जज्बात के जाल में “जग्गा जासूस”

✍प्रशांत रंजन☎09835758378
🌟कभी-कभी ऐसा होता है कि आप कोई स्वादिष्ट व्यंजन बनाने के लिए लंबे समय तक कई जतन करते हैं, उसकी सारी शर्तों को पुरा करते हैं, लेकिन अंततः चुल्हे से उतरने के बाद वह व्यंजन लोगों को स्वादिष्ट नहीं लगता। आपके व्यंजन की तारीफ नहीं होती। भले ही आप एक शानदार बावर्ची क्यों न हों। प्रतिभवान फिल्मकार अनुराग बसु की हालिया फिल्म ’जग्गा जासूस’ ऐसी ही है। चार साल से अधिक समय तक यह फिल्म निर्माणाधीन रही। शूटिंग के बाद कई रिशूटिंग, रिशेड्यूलिंग के बाद फिल्म पुरी हुई। इस दौरान बीच-बीच में फिल्म के डब्बाबंद हो जाने की अफवाहें भी उड़ती रहीं। रणबीर-कैटरीना के व्यक्तिगत रिश्तों के बदलते समीकरण, अनुराग-रणबीर के बीच फिल्म को लेकर तनातनी। स्मरण रहे अनुराग-रणबीर इस फिल्म के सह-निर्माता भी हैं। तीन बार रिलीज तारीख में बदलाव। इन सब के बाद भी दर्शकों को बेसब्री से ’जग्गा जासूस’ का इंतजार था, क्योंकि यही अनुराग-रणबीर की जोड़ी चार साल पहले सिने प्रेमियों को फिल्म ’बर्फी’ की मीठी सौगात दी थी। बर्फी में अनराुग ने बाॅलीवुड के बने फाॅर्मूले को तोड़ते हुए एक विलक्षण फिल्म रची थी। इसकी सफलता से उत्साहित होकर ही उन्होंने ’जग्गा जासूस’ को म्यूजिकल ड्रामे के रुप में रचा लेकिन अनजाने में हुई चूक की वहज से यह दर्शकों के गले नहीं उतरी। 
मर्डर, गैंग्स्टर, लाइफ इन ए मेट्रो जैसी सख्त, खुरदुरा, रियलिस्टिक फिल्में बनाने वाले साहसी व विवेकशील निर्देशक अनुराग बसु ने बर्फी से अपनी गियर बदली और सिनेमा माध्यम का खूबसूरत उपयोग करते हुए एक अलहदा फिल्म रच डाली। ’जग्गा जासूस’ भी उसी रास्ते पर जा रही थी, लेकिन भटक गईं। कहाँ? इसका उत्तर आगे मिलेगा। दरअसल, ’जग्गा जासूस’ की खासियत ही उसकी खामी बन गई। अनुराग ने तो अपनी सिनेमाई दृष्टि को वृहद करते हुए यूरोपियन म्यूजिकल ओपेरा की तर्ज पर फिल्म के पुरे कथानक को संगीतनुमा बना दिया। भारतीय सिनेमा के कायनात में संगीत की एक नपी-तुली परिभाषा है और उसी की परिधी में रहकर किसी फिल्म के लिए संगीत रचा जाता रहा है। अनुराग उस परिधी से परे जाकर कुछ अलग करने की सोची और संवाद को गानों के शक्ल में प्रस्तुत किया। संगीतकार प्रीतम ने संभवतः अपने करिअर में इस तरह का यह पहला काम किया होगा। एक फिल्म में छोटे-बड़े करीब ढ़ाई दर्जन गानें। चार गानों को छोड़ दें, तो बाकि गाने संवाद अदायगी के रुप में सामने आतें हैं। पंचलाइन वाले डायलाॅग पसंद करने वाले हिन्दी सिने प्रेमी को यह बात रास नहीं आयी। पूरी फिल्म के दौरान या तो जग्गा तुतलाता है या फिर गाता है। स्पष्ट डायलाॅग उसके खाते में नहीं हैं। ंलेकिन यह अनुराग की चूक नहीं है, क्योंकि यह एक प्रयोग था। असल चूक हुई पटकथा को लेकर। 
कबीर की पंक्ति है- दो पाटन के बीच में साबूत बचा न कोय…। दो ध्रुव को एक साथ साधने के चक्कर में अनुराग उलझ गए। कहानी का मुद्दा गंभीर चुन लिया। 1995 में हुए पुरुलिया आम्र्स ड्राॅप की पृष्ठभूमि में एक जासूसी कथा तैयार की और उसको बाल काॅमिक्स के अंदाज में प्रस्तुत कर दिया। प्रयोग किया इसकी तारीफ होनी चाहिए, लेकिन इस विचित्र प्रयोग ने पटकथा को खिचड़ी बना डाला। ’बर्फी’ जैसी स्पष्टता वे ’जग्गा जासूस’ में नहीं दिखा सके। इसको ऐसे समझा जा सकता है। एक तो कि कोई भी जासूसी कथा रोमांच, रहस्य, तर्क, तीक्ष्णता, तथा यथार्थवादी नजरिए पर आधारित होती है, क्योंकि ये सारे उस जासूसी कथा के आधार तत्व होते हैं। ’जग्गा जासूस’ में थोड़ा सा रहस्य था लेकिन बाकी सारे तत्व नदारद थे। दूसरा ये कि जासूसी कहानी को बाल काॅमिक्स के अंदाज में प्रस्तुत करने के पीछे निर्देशक की सोच थी, कि इससे उनकी फिल्म हास्य से भरपूर, रोचक बन जाएगी, जिसे बच्चे और बड़े दोनों पसंद करेंगे। यहीं गड़बड़ हो गई। अंतरराष्ट्रीय हथियार व्यापार जैसे गंभीर मुद्दे पर आधारित कहानी के बचकाना प्रस्तुतीकरण ने एक जासूसी कहानी के सारे मानदण्ड धवस्त कर दिए। अव्वल में बिना किसी ठोस तर्क के कहानी कही जा रही है, तिस पर भी उसकी बाल अंदाज में हुई प्रस्तुती ने फिल्म देखने का मजा किरकिरा कर दिया। परिणाम हुआ कि जटिल कथा-परत के कारण यह फिल्म न बच्चों को भायी और बचकाने प्रस्तुततीकरण के कारण न बड़ों को आकर्षित कर सकी।  
“जग्गा जासूस” में फिर अच्छा क्या है। रणबीर का अनोखा अभिनय प्रशंसनीय है। कैटरीना कैफ तो फिल्म में महज रणबीर की सह कलाकार भर हैं। पूरी फिल्म में कैटरीना कहीं से भी पत्रकार नजर नहीं आती हैं, जो कि उनका किरदार है। दूसरी अच्छी बात है फिल्म का आर्ट डायरेक्शन। परिजात पोद्दार ने मन मोहने वाले सेट डिजाइन किए हैं, जिसे एस. रवि ने करीने शूट किया है। मणिपुर के खूबसूरत लोकेशन पर फिल्माए गए दृश्य देखने लायक हैं। यूं भी हिन्दी फिल्मों में पूर्वोत्तर भारत को बहुत कम दिखाया गया है। ’जग्गा जासूस’ में यह एक अच्छा प्रयास है। गीतकार अमिताभ भट्टाचार्य की विशेष प्रशंसा होनी चाहिए। उन्होंने कवितानुमा, तुकबंदी वाले संवाद लिखे हैं, जो संवाद लेखन की दुनिया में विलक्षण कार्य है। और यह महज तुकबंदी नहीं हैं, बल्कि उन संवादों के बल पर पटकथा आगे बढ़ती है और रहस्य के परतें खुलती हैं। लेकिन ये सब एकाध चीजें हैं, जो टुकड़ों में अच्छी लगती हैं। सत्य यही है कि संपूर्णता में यह फिल्म दर्शकों को बांध नहीं पाती। 
इन कमियों के बावजूद फिल्म को दिलचस्प बनाया जा सकता था, अगर संपादन चुस्त किया जाता। ढ़ाई घण्टे से भी लंबी फिल्म है, जिसके अधिकर हिस्से में गाने हैं। जो गाना कथा को विस्तार नहीं दे पा रहा, उसे हटाया जाता। साथ ही हाॅस्टल एवं विदेश के कई दृश्य ऐसे हैं जिनकी लंबाई घटाई जा सकती थी। दो-तीन दृश्यों को तो हटाया भी जा सकता था। 
जो भी हो, किसी फिल्म का पसंद आना या न आना व्यक्तिगत मामला है, लेकिन इतना अवश्य कहा जा सकता है कि ’जग्गा जासूस’ के माध्यम से अनुराग ने एक साहसिक प्रयोग किया है। एक नपे-तुले परिधी में रहकर जज्बातों की फसल काटने वाले व्यवसायिक हिन्दी सिनेमा ने अपने पारंपरिक दर्शकों को भी जज्बाती बना दिया है। फिल्मकार खुद इससे अछूते नहीं हैं। यह भाव अनुराग जैसे विवेकशील निर्देशक के अंतर्मन में भी समाया हुआ है। अनुराग के मस्तिष्क में विवेक एवं जज्बात के द्वंद्व का परिणाम है “जग्गा जासूस”। 

                            

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